लोमश देवांगन, खरोरा।
छत्तीसगढ़ का फसल उत्सव "छेरछेरा"- सामूहिकता, दान और नई फसल के स्वागत का है प्रतीक, जो आपसी सहयोग, सामूहिकता और दानशीलता की परंपरा को दर्शाता है।
खरोरा,
छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक 'फसल उत्सव' लोकपर्व है, जो पौष पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो "सामूहिकता, दान और नई फसल के स्वागत" का प्रतीक है। पर्व का सीधा मतलब "दान" से है, खासकर नई फसल के अनाज (धान) का दान; जब लोग घर-घर जाकर 'छेरछेरा, कोठी के धान ला हेरा हेरा' गीत गाते हुए अन्न या पैसे मांगते हैं, जिसकी जड़े कल्चुरी राजा कल्याणसाय के समय और भगवान शिव-अन्नपूर्णा की कथा से जुड़ी है, जो आपसी सहयोग, सामूहिकता और दानशीलता की परंपरा को दर्शाता है, और माना जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है।
'छेरछेरा' का अर्थ और महत्व:-
'छेरछेरा' का अर्थ:- यह शब्द "छलका" या "छेदना" से भी जुड़ा है, लेकिन पर्व के संदर्भ में इसका अर्थ दान करना है, और यह एक तरह का सामूहिक उत्सव है जिसमें लोग अन्न का दान करते हैं।
फसल के बाद का त्योहार:- नई फसल कटने और खलिहान (अनाज रखने की जगह) से घर आने के बाद यह त्योहार मनाया जाता है, जो किसानों की मेहनत का फल होता है।
दान-पुण्य का पर्व:- इस दिन अन्नपूर्णा देवी और शाकंभरी देवी की पूजा की जाती है, और धान या नकद दान करने से घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती है, ऐसा माना जाता है।
सामूहिकता और संस्कृति:- यह पर्व समाज के सभी वर्गों को जोड़ता है और छत्तीसगढ़ की कृषि-प्रधान संस्कृति और सहयोग की भावना का प्रतीक है, जिसमें युवा डंडा नृत्य भी करते हैं।
कैसे मनाया जाता है:- बच्चे हाथ में टोकरी लेकर 'छेरछेरा, कोठी के धान ला हेरा हेरा' अर्थात् हे देवी, कोठी के धान को छान दो/दे दो जैसे पारंपरिक गीत गाते हुए घर-घर जाते हैं। घर के लोग खुशी-खुशी उन्हें धान, चावल या पैसे दान करते हैं। शाम को बच्चे इकट्ठा किए हुए अनाज से मेले में जाकर पकवान खाते हैं और मस्ती करते हैं।