खरोरा,
छत्तीसगढ़ में होली का त्योहार पारंपरिक रीति-रिवाजों लोकगीतों और आपसी भाईचारे के साथ मनाया जाता है। यहाँ होली केवल रंगों का खेल नहीं बल्कि सांस्कृतिक परंपराओं का एक अनूठा संगम है। 'छेका' और पैसा मांगने की परंपरा ग्रामीण अंचलों में आज भी जीवंत है। जैसे छेरछेरा त्योहार में अन्न (धान) मांगा जाता है वैसे ही होली से पूर्व कुछ ग्रामीण बच्चे इलाकों में टोलियां बनाकर रस्सी से रास्तों में आने जाने वालो को रोककर होली के लिए पैसा मांगते हैं फिर उन पैसों से होली के लिए लकड़ी इकट्ठा करते हैं एवं होलिका जलाते हैं।
गांव में एक ही स्थान पर होलिका दहन की परंपरा है। इसमें 'बैगा' (पारंपरिक पुजारी) द्वारा अग्नि प्रज्वलित की जाती है और लोग अपने घरों से लकड़ियां और छेना (गोबर के कंडे) लाते हैं। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के होलिका में ''बताशे की माला" का विशेष महत्व है जिसे होलिका में चढ़ाया जाता है जो भाईचारे और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। पुरुषों की टोलियां पारंपरिक वेशभूषा में नगाड़े की थाप पर लोकगीत (फाग) गाते हुए होली का आनंद लेते हैं। नगाड़ा यहां के पारंपरिक उत्सवों का अभिन्न हिस्सा रहा है। होली के अवसर पर नगाड़ा बजाने की परंपरा आज भी जीवंत है, जिससे पूरे माहौल में उत्साह और उमंग का संचार होता है।
दुकानदारों का कहना है कि इस वर्ष नगाड़ों की मांग में बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक दौर में भी लोग पारंपरिक वाद्ययंत्रों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। नगाड़ों की गूंज न केवल होली के रंग को और गहरा कर रही है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी संजोए हुए है।