खरोरा,
राजधानी के समीपस्थ ग्राम असौंदा (रायपुर वन परिक्षेत्र) में हाल ही में सामने आया अवैध लकड़ी का जखीरा वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। विभाग इसे भले ही अपनी 'सर्जिकल स्ट्राइक' और बड़ी उपलब्धि बताकर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह वन महकमे की अब तक की सबसे बड़ी और शर्मनाक नाकामी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 500 ट्रैक्टर से ज्यादा अवैध लकड़ी और 2 अवैध कोयला भट्ठे रातों-रात तो तैयार नहीं हो गए? इतने बड़े पैमाने पर जंगलों की बेतहाशा कटाई होती रही और वन विभाग के बीट गार्ड से लेकर उच्च अधिकारी तक वर्षों तक गहरी नींद में सोते रहे।
नाकामी और विभागीय मिलीभगत के स्पष्ट प्रमाण-
* 15 सालों तक अंधेरगर्दी: ग्राम असौंदा में पिछले 15-16 वर्षों से खुलेआम लकड़ी का अवैध कारोबार चल रहा था। एक दशक से भी ज्यादा समय तक वन विभाग का गश्ती दल और खुफिया तंत्र पूरी तरह से फेल साबित हुआ।
* 500 ट्रैक्टर लकड़ी का स्टॉक: 500 ट्रैक्टर लकड़ी इकट्ठा करना कोई एक-दो दिन का काम नहीं है। इतनी विशाल मात्रा में बबूल, कऊहा, कसही, करही और बहेरा के पेड़ों का कत्लेआम कर उन्हें एक जगह डंप किया गया, लेकिन रायपुर वन परिक्षेत्र और उड़नदस्ते को इसकी भनक तक नहीं लगी। यह सीधे तौर पर अधिकारियों की लापरवाही या माफियाओं के साथ उनकी मिलीभगत की ओर इशारा करता है।
* अपनी पहल पर नहीं, शिकायत पर खुली नींद: विभाग का अपना सूचना तंत्र पूरी तरह मृत प्राय दिखा। अधिकारियों ने स्वतः कोई संज्ञान नहीं लिया। जब ग्रामीणों का दबाव बढ़ा और जनपद उपाध्यक्ष श्रीमती दुलारी सुरेंद्र वर्मा ने लगातार शिकायतें कीं, तब जाकर भारी दबाव में वन अमले को यह जब्ती की कार्रवाई करनी पड़ी।
जवाबदेही से बचने की कोशिश और बहानेबाजी:
वन संपदा लुट जाने के बाद अब कार्रवाई का श्रेय लेने के लिए बड़े अधिकारियों के नाम आगे किए जा रहे हैं। रेंजर दीपक कुमार तिवारी और उनके उड़नदस्ते ने जब्ती कर भट्ठे सील जरूर किए हैं, लेकिन वे उन सवालों से नहीं बच सकते कि इतने सालों से यह अवैध कारोबार किसके संरक्षण में फल-फूल रहा था? जिन कर्मचारियों की नाक के नीचे लकड़ी का यह पहाड़ खड़ा हुआ, उन पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है?
इसके अलावा, मामले को टालने की भी रूपरेखा नजर आ रही है। रेंजर दीपक कुमार तिवारी का यह बयान कि "राजस्व विभाग की जांच बाकी होने के कारण आगे की वैधानिक कार्यवाही लंबित है," स्पष्ट करता है कि अब इस पूरे मामले को विभागीय प्रक्रियाओं में उलझाने और एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ने की तैयारी है, ताकि असल दोषियों और लापरवाह अधिकारियों को बचाया जा सके।