शिकायत के बावजूद नहीं जागा प्रशासन, बेघर हुए वन्यजीवों के गांव में घुसने से दहशत में ग्रामीण
खरोरा,
एक ओर शासन 'एक पेड़ मां के नाम' और सामाजिक वानिकी जैसी योजनाओं का ढिंढोरा पीटकर करोड़ों रुपए खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों को मुंह चिढ़ा रही है। खरोरा तहसील के ग्राम पंचायत नकटी कुम्हारी में भू-माफिया दिनदहाड़े 15 एकड़ शासकीय जंगल को उजाड़कर खेत बनाने में लगे हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि ग्रामीणों द्वारा लिखित शिकायत देने के बाद भी राजस्व और वन विभाग कुंभकर्णी नींद सो रहा है। विभागों की यह रहस्यमयी चुप्पी सीधे तौर पर भू-माफियाओं को संरक्षण देने की ओर इशारा कर रही है।
ग्रामीणों ने पसीने से सींचा था जंगल, माफिया चला रहे कुल्हाड़ी
जानकारी के अनुसार, ग्राम नकटी कुम्हारी के हल्का नम्बर 26 के खसरा नंबर 7 की लगभग 15 एकड़ जमीन राजस्व रिकॉर्ड में 'जंगल मद' में दर्ज है। वर्षों पहले ग्रामीणों ने श्रमदान कर सामाजिक वानिकी के तहत यहां पौधे लगाए थे और उन्हें सहेज कर जंगल का रूप दिया था। लेकिन, पिछले एक पखवाड़े से 10 से अधिक लोगों का एक समूह सुनियोजित तरीके से इन हरे-भरे पेड़ों की कटाई कर रहा है। मकसद साफ है—जंगल साफ कर शासकीय जमीन पर कब्जा करना और उसे खेती योग्य बनाना।
वन्यजीवों पर मंडराया मौत का साया, ग्रामीणों में दहशत
जंगल की इस बेतहाशा कटाई से पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इस 15 एकड़ के जंगल में सैकड़ों जंगली सूअरों का झुंड, 50 से अधिक लकड़बग्घे, लोमड़ी और हिरन जैसे वन्यजीव निवास करते हैं। अब इनका आशियाना उजड़ने से ये जीव गांव की ओर पलायन कर रहे हैं। इससे गांव में न केवल जान-माल की हानि का खतरा बढ़ गया है, बल्कि ग्रामीण खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं।
15 जून को दी गई थी शिकायत, न पटवारी पहुंचा न बीट गार्ड
इस गंभीर मामले की लिखित सूचना ग्राम पंचायत के सरपंच, सचिव और ग्रामीणों द्वारा 15 जून को ही तहसील कार्यालय खरोरा में दे दी गई थी। सरपंच प्रतिनिधि परशुराम यदु ने स्वयं पहल कर अतिक्रमणकारियों को समझाइश भी दी थी। इसके बावजूद, न तो राजस्व विभाग का कोई पटवारी मौके पर पहुंचा और न ही वन विभाग के बीट गार्ड ने सुध ली।
जिम्मेदार बोले- "फोन पर नहीं, ऑफिस आकर बात करो"
जब इस संगीन मामले में पत्रिका ने खरोरा तहसीलदार शेखर मंडई से फोन पर उनका पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। 15 एकड़ जंगल कटने जैसे गंभीर मुद्दे पर उन्होंने केवल इतना कहा, "तहसील कार्यालय आकर चर्चा करें" और फोन काट दिया। एक जिम्मेदार अधिकारी का यह रवैया उनकी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाता है।
कानून का मखौल उड़ा रहे दोनों विभाग
वन विभाग: भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत आरक्षित/संरक्षित वन क्षेत्र में हरे पेड़ काटना संज्ञेय अपराध है, जिसमें तत्काल FIR और गिरफ्तारी का प्रावधान है। फिर भी वन अमले ने न पंचनामा बनाया, न जब्ती की।
राजस्व विभाग: मप्र/छग भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत राजस्व विभाग के पास तत्काल अतिक्रमण हटाने की शक्ति है, लेकिन तहसील स्तर पर अब तक कोई जांच दल ही गठित नहीं किया गया।
उच्चाधिकारियों के दखल की दरकार
इस पूरे घटनाक्रम ने शासन की कथनी और करनी के अंतर को उजागर कर दिया है। ग्रामीण अब सवाल पूछ रहे हैं कि जब रक्षक ही मूकदर्शक बन जाएं, तो वे न्याय मांगने कहां जाएं? यदि समय रहते जिले के उच्चाधिकारियों (कलेक्टर और डीएफओ) ने संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई नहीं की, तो नकटी कुम्हारी का यह जंगल इतिहास बन जाएगा और इसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।