"कोई भी शिकायत करे ऐसे थोड़े होगा भाई" : खरोरा तहसीलदार का बेतुका बयान, ग्रामीणों में आक्रोश

Lomash MR Dewaangan 2026-06-23

शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा: तहसीलदार का बेतुका बयान, तो सचिव ने झाड़ा पल्ला! ग्रामीणों का फूटा गुस्सा- अधिकारियों की निष्क्रियता से भू-माफियाओं की भेंट चढ़ रहा गांव

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खरोरा,
           ग्राम पंचायत मांठ में मुख्य मार्ग (मेनरोड) से लगी 51 डिसमिल शासकीय भूमि (खसरा नं. 438) पर हो रहे अवैध निर्माण को लेकर प्रशासन का बेहद ढुलमुल और गैरजिम्मेदाराना रवैया सामने आया है। एक तरफ जहां जनपद पंचायत उपाध्यक्ष श्रीमती दुलारी सुरेन्द्र वर्मा की लिखित शिकायत पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, वहीं अब इस मामले में तहसीलदार, पंचायत सचिव और ग्रामीणों के अलग-अलग बयानों ने एक बड़े प्रशासनिक घालमेल को उजागर कर दिया है।

तहसीलदार का बेतुका और गैरजिम्मेदाराना बयान
           जब 'टुडे न्यूज़' ने इस गंभीर मामले में खरोरा तहसीलदार से उनका आधिकारिक पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए कहा, "इसका रिपोर्ट तो बिलकुल ले लिया गया है और पंचायत ने भी बता दिया कि जमीन उसकी (कब्जाधारी की) है। कोई भी शिकायत करे ऐसे थोड़े होगा भाई। वह खुद लेकर आ जाए दस्तावेज।"
            राजस्व विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी का यह बयान न केवल हास्यास्पद है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि जब सरकारी जमीनों का सारा रिकॉर्ड (खसरा, बी-1, नक्शा) तहसील कार्यालय और पटवारी के पास होता है, तो अधिकारी शिकायतकर्ता (जो स्वयं जनपद पंचायत उपाध्यक्ष हैं) से ही दस्तावेज क्यों मांग रहे हैं?

सचिव के बयान ने खोली तहसीलदार के दावों की पोल
             तहसीलदार भले ही यह दावा कर रहे हों कि 'पंचायत ने जमीन कब्जाधारी की बता दी है', लेकिन मांठ पंचायत के सचिव शिवचरण वर्मा का बयान कुछ और ही कहानी बयां कर रहा है। इस मामले पर सचिव शिवचरण वर्मा ने कहा कि, "ग्रामीणों द्वारा शिकायत की गई है, इस मामले पर पटवारी से जानकारी ली जाएगी।"
             अब यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पंचायत सचिव खुद कह रहे हैं कि अभी पटवारी से जानकारी ली जाएगी, तो तहसीलदार ने किस आधार पर और बिना किसी जांच के यह मान लिया कि जमीन कब्जा करने वाले की है? यह सीधा-सीधा विरोधाभास किसी बड़े संरक्षण की ओर इशारा कर रहा है।

ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों में भारी आक्रोश
             प्रशासन की इस निष्क्रियता और भू-माफियाओं के हौसले देखकर ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। ग्रामीण शत्रुहन सेन, यशवंत वर्मा और ग्राम पंचायत के पंच राकेश यादव सहित अन्य ग्रामीणों ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि, "तहसीलदार की निष्क्रियता के कारण गांव की कीमती जमीन माफियाओं की भेंट चढ़ रही है।"
             ग्रामीणों ने चिंता जताते हुए कहा कि अगर मुख्य मार्ग से लगी यह बेशकीमती शासकीय जमीन भू-माफियाओं के कब्जे में चली गई, तो भविष्य में गांव में स्कूल, अस्पताल या अन्य विकास कार्यों के लिए शासकीय जमीन की भारी किल्लत हो जाएगी, जिससे पूरे गांव का विकास बाधित होगा।

प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर उठते गंभीर सवाल:
       ० जब सचिव अभी पटवारी से रिकॉर्ड मांगने की बात कर रहे हैं, तो तहसीलदार ने शिकायत को खारिज करने और जमीन को निजी बताने की जल्दबाजी क्यों दिखाई?
       ० क्या बिना किसी आधिकारिक सीमांकन के ही शासकीय भूमि भू-माफियाओं को सौंपी जा रही है?
       ० असंवेदनशील भाषा शैली: "कोई भी शिकायत करे ऐसे थोड़े होगा भाई" – एक जिम्मेदार अधिकारी का यह हल्का लहजा दर्शाता है कि उन्हें न तो 'सुशासन शिविर' में आए आवेदनों की परवाह है और न ही जनप्रतिनिधियों की लिखित शिकायतों का कोई सम्मान है।
       ० आम आदमी की क्या बिसात: जब एक जनपद पंचायत उपाध्यक्ष श्रीमती दुलारी सुरेन्द्र वर्मा की शिकायत पर तहसीलदार का यह रवैया है, तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम जनता की शिकायतों को तहसील कार्यालय में किस तरह रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता होगा।

           मांठ का यह मामला सिर्फ एक जमीन के टुकड़े का नहीं, बल्कि सिस्टम की उस लापरवाही का है जहां रक्षक ही मूक दर्शक बने हुए हैं। 'टुडे न्यूज़' इस मुद्दे को तब तक उठाता रहेगा जब तक खसरा नंबर 438 की इस 51 डिसमिल जमीन का निष्पक्ष सीमांकन कर दूध का दूध और पानी का पानी नहीं हो जाता। अब देखना यह है कि उच्चाधिकारी इस मामले में कब नींद से जागते हैं।
            दरअसल, राजस्व विभाग का मुख्य उद्देश्य शासकीय भूमि और संपत्तियों का संरक्षण करना तथा पारदर्शी तरीके से राजस्व जुटाना है। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए स्थानीय स्तर पर पटवारी, आरआई (राजस्व निरीक्षक) और तहसीलदार की नियुक्ति की जाती है। एक तहसील क्षेत्र में तहसीलदार ही पीठासीन और सर्वोच्च अधिकारी होता है।
           लेकिन इसके विपरीत, खरोरा तहसील इन दिनों अवैध कब्जों और सरकारी जमीनों की खरीद-बिक्री के मामलों में पूरे प्रदेश में कुख्यात हो चुकी है। विडंबना यह है कि जब कोई जागरूक नागरिक या ग्रामीण भू-माफियाओं के खिलाफ शिकायत लेकर तहसीलदार के पास पहुंचता है, तो कार्रवाई करने के बजाय उल्टा शिकायतकर्ता को ही धमकाया जाता है और उनसे ही सबूत मांगे जाते हैं। कायदे से राजस्व विभाग को ऐसे साहसी ग्रामीणों और मीडियाकर्मियों का सम्मान कर उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए, लेकिन इसके उलट उन्हें निराशा और हताशा का सामना करना पड़ता है।
             समाज की कड़वी सच्चाई यह है कि किसी भी गांव या क्षेत्र में अपराधियों और भू-माफियाओं के खिलाफ गिने-चुने लोग ही आवाज उठाने की हिम्मत जुटा पाते हैं। ऐसे में यदि जिम्मेदार अधिकारी ही अपराधियों के पक्षधर बन जाएं, तो ये मुट्ठी भर समाजसेवी भी पीछे हटने को मजबूर हो जाते हैं। इससे क्षेत्र में स्थिति और अधिक गंभीर व अराजक हो जाती है।
            आज के इस दौर में, जहां आम इंसान दुश्मनी मोल लेने से डरता है, वहां कुछ जागरूक ग्रामीणों द्वारा हिम्मत जुटाकर शिकायत करना अपने आप में बड़ी बात है। लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा बेतुके बयान देकर उन्हें गुमराह करना और डराना, शासन-प्रशासन की लचर कार्यप्रणाली को आइना दिखाता है।
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