खरोरा वन परिक्षेत्र में लकड़ी माफिया बेलगाम; 19 जून को सील किए गए 20 भट्टों में फिर झोंकी जा रही हरे-भरे पेड़ों की बलि।
छत्तीसगढ़ के जंगलों को बचाने के दावे किस तरह फाइलों में दफ्न हो रहे हैं, इसका जीता-जागता और खौफनाक उदाहरण खरोरा वन परिक्षेत्र में देखने को मिला है। जिन अवैध कोयला भट्टों पर वन विभाग ने पिछले महीने अपना 'सरकारी ताला' और सील लगाकर अपनी पीठ थपथपाई थी, आज उन्हीं भट्टों की सील तोड़कर लकड़ी माफिया ने सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा जड़ा है। भट्टों में फिर से हरे-भरे पेड़ों की लकड़ियां धधक रही हैं, आसमान में अवैध कोयले का काला धुआं उड़ रहा है, और वन विभाग गहरी नींद में सोया है।
सिस्टम की नाकामी या माफिया से साठगांठ?
महज एक महीने पहले, 19 जून को वन विभाग ने बड़ा तामझाम करते हुए अभियान चलाया था। तब लगभग 500 ट्रैक्टर अवैध लकड़ी (कऊहा, कसही, करही, बहेरा आदि) जब्त की गई थी और 20 अवैध कोयला भट्टों को सील किया गया था। विभाग ने इसे एक 'बड़ी सर्जिकल स्ट्राइक' बताकर वाहवाही लूटी थी। लेकिन हालिया जांच में जो सच सामने आया, उसने अधिकारियों और स्थानीय ग्रामीणों, दोनों को सन्न कर दिया। अधिकांश भट्टों की सील टूटी पड़ी है और नई गीली लकड़ियां जलाकर फिर से कोयला बनाने का काला कारोबार बेखौफ जारी है।
रिपोर्ट की मुख्य बातें:
- खुली चुनौती: माफिया ने सरकारी सील तोड़कर यह साबित कर दिया है कि उन्हें कानून या वन विभाग का कोई खौफ नहीं है।
- हरे पेड़ों की बलि: भट्टों में नई और गीली कऊहा तथा अन्य मिश्रित प्रजाति की लकड़ियां झोंकी जा रही हैं।
- रात के अंधेरे में खेल: ग्रामीणों के अनुसार, रात होते ही तस्कर सक्रिय हो जाते हैं और जंगलों का सीना चीरकर लकड़ियां भट्टों तक पहुंचाते हैं।
- निगरानी शून्य: करोड़ों का बजट और गश्त के बड़े-बड़े दावों के बावजूद, सील किए गए भट्टों की कोई मॉनिटरिंग नहीं की गई।
ग्रामीणों का फूटा गुस्सा-
मौके पर मौजूद ग्रामीणों ने वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि केवल भट्टों पर सील लगाकर खानापूर्ति करने से जंगल नहीं बचेंगे। जब तक माफियाओं और दोषियों की गिरेबान तक कानून के हाथ नहीं पहुंचेंगे, यह खेल चलता रहेगा। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि कार्रवाई के नाम पर सिर्फ दिखावा होता है, जबकि रात के अंधेरे में तस्करों को खुली छूट मिली हुई है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार अधिकारी?
जब इस मामले में अधिकारियों से जवाब मांगा गया, तो फिर वही रटा-रटाया सरकारी जवाब सामने आया:
"गीली कऊहा लकड़ी का उपयोग और शासन द्वारा सील भट्ठे का संचालन किए जाने का मामला सामने आया है। कार्रवाई की जा रही है और विस्तृत रिपोर्ट उच्च अधिकारियों को उचित कार्रवाई हेतु भेजी जाएगी।"
- दीपक तिवारी, वन अधिकारी
"मामले की जांच जारी है, जो भी आवश्यक और कड़ी कार्रवाई होगी, वह की जाएगी।"
- सीसीएफ, रायपुर
टुडे न्यूज़ का सवाल:
आखिर कब तक 'जांच जारी है' और 'कार्रवाई की जाएगी' जैसे बयानों की आड़ में जंगलों की नीलामी होती रहेगी? अगर सील किए गए भट्टे दोबारा सुलग सकते हैं, तो क्या यह सीधे तौर पर वन विभाग की गश्त प्रणाली की विफलता नहीं है? समय आ गया है कि सरकार सिर्फ कागजी कार्रवाई से बाहर निकले और उन लोगों को जेल की सलाखों के पीछे डाले, जिनकी शह पर यह पूरा काला साम्राज्य खड़ा है। पर्यावरण बचेगा, तभी भविष्य बचेगा।