हलषष्ठी माताओं के त्याग और प्रकृति से जुड़ाव का पर्व है: आचार्य चेतन प्रसाद द्विवेदी

Lomash MR Dewaangan 2026-09-02

भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया गया पर्व, बिना हल चले अनाज का हुआ उपयोग। पसहर चावल, सात प्रकार की भाजियां और भैंस के दूध-दही से माताओं ने तोड़ा व्रत

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संतान की दीर्घायु के लिए माताओं ने रखा हलषष्ठी (कमरछठ) का निर्जला व्रत
जगह-जगह 'सगरी' बनाकर महिलाओं ने की भगवान शिव और माता पार्वती की सामूहिक पूजा 

ख़रोरा,

           छत्तीसगढ़ की पारंपरिक और सनातन संस्कृति का प्रतीक पर्व हलषष्ठी (जिसे स्थानीय भाषा में कमरछठ भी कहा जाता है) आज खरोरा नगर सहित समूचे ग्रामीण अंचलों में अपार श्रद्धा, भक्ति और परंपरा के साथ मनाया गया। अंचल की हजारों माताओं ने अपनी संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए निर्जला उपवास रखा।

संतान के प्रति असीम प्रेम और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है यह व्रत:

             पर्व के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य चेतन प्रसाद द्विवेदी जी ने बताया कि, "सनातन धर्म में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई दाऊ बलराम जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र 'हल' है, इसलिए इस दिन हल से जोते गए किसी भी अन्न या सब्जी का सेवन वर्जित होता है। यह व्रत माताओं के त्याग और अपनी संतान के प्रति उनके असीम प्रेम का प्रतीक है। इसके साथ ही, बिना हल चले उत्पन्न हुए प्राकृतिक अन्न (पसहर) और महुआ-पलाश का उपयोग हमें सीधे तौर पर हमारी प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण से भी जोड़ता है।"

सगरी बनाकर हुई शिव-पार्वती की आराधना:

           आज सुबह से ही खरोरा नगर के विभिन्न वार्डों और आसपास के ग्रामीण अंचलों में उत्सव और उल्लास का माहौल रहा। गली-मोहल्लों और मंदिरों के प्रांगण में महिलाओं ने सामूहिक रूप से 'सगरी' (एक प्रतीकात्मक छोटा तालाब) का निर्माण किया। सगरी के पास कांशी, पलाश (परसा) और महुआ की डालियां सजाकर भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। सभी व्रतधारी महिलाओं ने एक साथ बैठकर हलषष्ठी माता की कथा सुनी।

बच्चों को लगाया गया 'पोता'

            कथा समापन के पश्चात एक विशेष और भावुक परंपरा का निर्वहन किया गया। माताओं ने अपनी संतानों की पीठ पर पोता (भैंस के दूध, दही, घी या गोबर से तैयार किया गया प्रतीकात्मक टीका/छाप) लगाकर हलषष्ठी माता से उनके सुखी और लंबे जीवन का आशीर्वाद मांगा।

पसहर चावल और भैंस के दूध-दही का विशेष महत्व:            इस व्रत में पारण (व्रत तोड़ने) की विधि बेहद खास होती है। खरोरा क्षेत्र की महिलाओं ने कथा और पूजा के बाद बिना हल चले उत्पन्न हुए अनाज, यानी 'पसहर चावल' (पसही) से अपना निर्जला व्रत तोड़ा। प्रसाद व भोजन के रूप में सात प्रकार के अनाज (गेहूं, अरहर, मसूर, चना, मूंग, धान/चावल और महुआ) तथा सात प्रकार की भाजियों (सब्जियों) का उपयोग किया गया। इसके साथ ही, इस व्रत में गाय के बजाय केवल भैंस के दूध, दही और घी के उपयोग की मान्यता है, जिसका माताओं ने पूर्ण रूप से पालन किया।

           खरोरा, केशला और इसके आसपास के गांवों में दिन भर इस पारंपरिक त्यौहार की धूम रही। यह पर्व न केवल माताओं के अपनी संतान के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाता है, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक-संस्कृति का भी अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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